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संक्षिप्त इतिहास

भारत के विविधितापूर्ण भोगोलिक क्षेत्रों में अनेक प्रकार की वनस्पति एवं अनेक प्रकार के वन हैं I इतनी विविधता विश्व में अन्यत्र नहीं है इ प्राचीन काल से भारत के वनस्पति संसाधन देशी और विदेशी व्यापारियों को आकर्षित करते आ रहे हैं I अरबी , तुर्की , पुर्तगाली , डच , फ़्रांसिसी तथा अंत में ब्रिटिश व्यापारी आये I संभवतः सबसे पहले आये पुर्तगाल के व्यापारी I उनके बाद डच और अंततः ब्रिटिश व्यापारियों ने ईस्ट कंपनी की स्थापना की जिसने धीरे धीरे देश का शासन सूत्र अपने हाथों में ले लिया I

भारत की वन सम्पदा के वैज्ञानिक दोहन एवं प्रबंधन के लिए नीतियों का निर्धारण हुआ I ऐसी परिस्थिति में देश के विपुल वनस्पति संसाधन के सर्वेक्षण हेतु एक संस्थान का गठन आवश्यक हो गया I

सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पौधों के औषधीय गुणों की उपयोगिता जानने के लिए उत्तरी इटली में पठन – पाठन आरम्भ हुआ I इसके लिए तरह तरह के उद्यान बनाये गए जो पादप विज्ञान में सहायक हुए . इटली के बहार के चिकित्सकों ने भी इसमे रूचि ली .

1534 में एक विख्यात पुर्तगाली चिकित्सक गार्सिया डी ओर्टा ने पौधों के अध्ययन हेतु गोवा में उद्यान लगाया . पादप विज्ञान में उनका योगदान महत्वपूर्ण है . लगभग एक शताब्दी के बाद वैन रीड मालाबार प्रदेश के डच गवर्नर हुए . उन्होंने इस क्षेत्र के पौधों का अध्ययन किया तथा दक्षिण भारत के पौधों के सुखाये गए नमूनों का भंडार बनाया . उनकी पुस्तक ‘ होरट्स मलेबारिकास (1678 – 1703 ) की लिनियस ने भी प्रशंसा की . ईस्ट इंडिया कंपनी मद्रास अंचल के पौधे संग्रह करने लगी . क्रमशः सारे भारत के पौधों के संग्रह होने लगे . इस दिशा में कार्य करने वालों में कुछ प्रमुख नाम हैं कोएनिग , रोक्सबर्ग , हेन , वाइट , कैम्पबेल , थन्बर्ग , बुकनन , वालिच आदि . इनमे कुछ लोगों ने अपने संग्रह लिनिअस , सर जोसेफ़ बैंकस , इकर आदि विशेषज्ञों को भेजे . 

कर्नल रोबर्ट किड की सिफारिश पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1787 में शिवपुर ( कलकाता ) में एक उद्यान बनाया . बाद में बम्बई , सहारनपुर , मद्रास आदि में भी उद्यान का अपना पाद्पालय बना . उनके कारणों से पादप टेक्सोनोमी अत्यंत महत्वपूर्ण हो गयी . अभी तक पादप विज्ञान में सारे कार्य व्यक्तिगत रूप से होते थे . ऐसे कार्यों के संयोजन का प्रथम प्रयास 1858 में हुआ . अब भारत का शासन सूत्र ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश शासन सत्ता के हाथों में चला गया .

शिवपुर के वनस्पति उद्यान को लोग कंपनी बगान कहते थे . अब इसका नाम हो गया ‘ रॉयल बोटेनिक गार्डन’ . 1871 में इसका कार्यभार संभालने के बाद ब्रिगेड सर्जन ले कर्नल जॉर्ज किंग ने 1882 में एक नया पाद्पालय बनवाया . 1897 में जब सर जॉर्ज किंग यहाँ से जा रहे थे , पद्पालय में नमूनों कि संख्या दस लाख हो गयी थी . भारत सर्कार ने अब पश्चिमोत्तर पंजाब के सीमान्त क्षेत्रों , सेंट्रल प्रोविंस , मध्य भारत , राजपूताना , असम , बर्मा एवं अंडमान के गवेषणा का कार्यक्रम बनाया . जुलाई 1887 में इस प्रस्ताव का अनुमोदन हुआ . १३ फरवरी 1890 को भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण का औपचारिक गठन हुआ . सर्वेक्षण को उस समय निम्नलिखित दायित्व दिए गए :

  1. भारतीय साम्राज्य के पादप संसाधनों की गवेषणा
  2. भारत के विभिन्न भागों में हो रहे वानस्पतिक कार्यों के संयोजन

सर्वेक्षण की सुविधा के लिए देश को चार वानस्पतिक क्षेत्रों में बांटा गया – उत्तर , दक्षिण , पूरब , पश्चिम . इनके केंद्र क्रमशः सहारनपुर , मद्रास , कलकत्ता ( शिवपुर ) और बम्बई ( पूना ) हुए . कलकत्ता को भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण का मुख्य केंद्र माना गया . कलकत्ता ( शिवपुर ) उद्यान के अधीक्षक सर जॉर्ज किंग को केंद्रीय दायित्व देने के साथ ही सर्वेक्षण का निदेशक बनाया गया .

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण को कुछ विश्व विख्यात प्रक्रितिविदों और वनस्पतिज्ञों की विरासत मिली है ; जैसे - टोमस हेनरी कोलब्रुक , एच फौकनर , विलियम ग्रिफिथ , बूकनन – हेमिल्टन , विलियम रोक्सबर्ग , नेथेनिअल वालिच , डेविड प्रेन , जे एफ डथी , आर स्ट्रेचे , जे इ विंटरबौटम , डब्लू मुरक्रॉफ्ट , जे एफ रॉयल आदि . दक्षिण एवं दक्षिण - पूर्व एशिया में पादप गवेषणा तथा टेक्सोनोमिकल अध्ययन हेतु भारत को आधार के रूप में चुना गया था . आज़ादी के बाद भोगोलिक और राजनैतिक सीमाएँ बदल गयीं . देश की अर्थ व्यवस्था मज़बूत बनाने के लिए तत्काल पादप संसाधनों का व्यापक प्रलेखन आवश्यक हो गया . उनके समुचित सर्वेक्षण की योजना के साथ अक्टूबर 1952 में डा इ के जानकी अम्माल को विशेष कार्यभार अधिकारी नियुक्त किया गया .

भारत सरकार द्वारा 29 मार्च 1954 को सर्वेक्षण के पुनर्गठन की योजना का अनुमोदन हुआ . कलकत्ता में सर्वेक्षण का मुख्यालय बनाकर इसके समक्ष निम्नलिखित उद्देश्य रखे गये :

  • गहन सर्वेक्षण के आधार पर देश की पादप संसाधन की व्याप्ति , पारिस्थितिकी एवं आर्थिक उपयोगिता पर सुनिश्चित एवं विस्तृत जानकारी एकत्र करना .
  • शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों के लिए उपयोगी सामग्री के संग्रह , अभिनिर्धारण एवं वितरण
  • सुव्यवस्थित पाद्पालयों में विश्वनीय संग्रह के अभिरक्षण तथा स्थानीय , जिला , राज्य एवं राष्ट्रीय वनस्पतिजात के रूप में पादप संसाधनों के प्रलेखन

सर्वेक्षण को दिए गए इस विशाल कार्य के निष्पादन हेतु देश को चार विभिन्न वानस्पतिक क्षेत्रों में बाँट दिया गया :
  • भा . व . स ., दक्षिणी मंडल , कोइम्बतूर : 10 मार्च 1965
  • भा . व . स ., पूर्वी मंडल , शिलोंग : 1 अप्रैल 1956
  • भा . व . स ., पश्चिमी मंडल , पूना : 12 दिसम्बर 1955
  • भा . व . स ., उत्तरी मंडल , देहरादून : 13 अगस्त 1956

कोशिका विज्ञान , पादप कायिकी , पादप रसायन , बीज विज्ञानं , पारिस्थितिकी आदि विभिन्न पक्षों के अध्ययन हेतु लखनऊ में केंद्रीय वनस्पति प्रयोगशाला की स्थापना हुई . इससे पारस्परिक पादप टेक्सोनोमी के बहु - आयामी अध्ययन का पथ प्रशस्त हुआ .

रॉयल बोटेनिक गार्डन का नाम अब भारतीय वनस्पति उद्यान रखा गया . इसका पाद्पालय भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण को सौंप दिया गया जो केंद्रीय राष्ट्रीय पाद्पालय के नाम से विख्यात हुआ . भारतीय वनस्पति उद्यान पश्चिम बंगाल सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में था . 1 जनवरी 1963 को यह भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के नियंत्रण में आ गया . सर्वेक्षण कार्य के सुचारू निष्पादन हेतु निम्नलिखित अतिरिक्त मंडल बनाये गए :

  • मध्य मंडल , इलाहाबाद , 1962
  • शुष्क क्षेत्र मंडल , जोधपुर , 1972
  • अंडमान निकोबार मंडल , पोर्ट ब्लेयर , 1972
  • अरुणाचल प्रदेश मंडल , ईटानगर , 1977
  • सिक्किम हिमालय मंडल , गंगटोक , 1979
  • भारतीय गणतंत्र का वनस्पति उद्यान , नॉएडा
  • दक्कन मंडल , हैदराबाद , 2005

 

पिछला परिवर्तन : 17/11/2017